आशा भोसले और पंचम यानी आरडी बर्मन का आमना-सामना पहली बार तब हुआ जब पंचम अपने पिता सचिन देव बर्मन के सहायक थे. आशा भोसले तब 23 साल की थीं और पंचम थे 17 साल के एक किशोर.
वो भागकर आशा जी के ऑटोग्राफ़ लेने आए थे. ये कहते हुए कि मैंने आपके कुछ नाट्यगीत रेडियो पर सुने हैं. किसी को पता नहीं था कि आगे चलकर ये जोड़ी हिंदी फ़िल्म-संगीत को हमेशा के लिए बदल देगी.
आशा और पंचम का पहला साथ शुरू होता है सन 1966 में आई फ़िल्म ‘तीसरी मंज़िल’ से. नासिर हुसैन की इस फ़िल्म के लिए जब पंचम को चुना गया तो वो किसी इम्तिहान से कम नहीं था.
शम्मी कपूर ने ख़ुद बताया था कि उन्होंने पंचम से मिलने की मांग की और गाने सुनने चाहे. उनकी जोड़ी शंकर-जयकिशन के साथ पक्की थी.
जब पंचम ने अपनी पहली ट्यून सुनायी तो शम्मी फ़ौरन पहचान गये कि ये एक नेपाली गाने ‘हे कांचा मलाई सुनको तारा’ से प्रेरित है.
इस घटना का ब्योरा बहुत लम्बा है इसलिए ये फिर सही. बहरहाल… ‘तीसरी मंज़िल’ वो पहली फ़िल्म थी-जिसमें आशा भोसले ने पंचम के लिए गाया.

