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जो जीवन मैंने जिया – वो चाहा नहीं कभी

आज फिर से कुछ लिखने का मन किया

कलम ली और लिखने लगेंगे हम,

फिर सोचा क्या लिखे और क्यू लिखे

चलो दर्द पर कुछ लिखा जाए

लेकिन दर्द का एहसास तो

जिसे दर्द मिलता है बस वही बता सकता है

फिर हम कैसे लिखे

बस इसी कशमकश में लिखने लगेंगे हम –

जो जीवन मैंने जिया –
वो चाहा नहीं कभी,
जो जीवन में चाहा –
वो जिया नहीं कभी,

काश की वो आ कर कुछ तो कह दे कभी हमसे –

हम भी जीने लगेंगे फिर से कसम से

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