अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस हफ्ते राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने के लिए चीन की यात्रा करेंगे.
करीब एक दशक के बाद यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा होगी. ये यात्रा 13 से 15 मई तक चलेगी.
यह यात्रा दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंधों के निर्णायक मोड़ पर हो रही है.
बोइंग, सिटीग्रुप और क्वालकॉम सहित अमेरिका की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों के अधिकारियों के ट्रंप के साथ यात्रा करने की उम्मीद है. ऐसा चीन की कंपनियों के साथ डील करने के लिए हो सकता है.
यह अमेरिका और चीन के बीच नाजुक व्यापार समझौते की एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी होगी
.बीते साल अप्रैल में राष्ट्रपति ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ़ लगाने की घोषणा की.
ट्रंप के इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वॉर छिड़ गई. इस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे पर 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगाए.
ट्रंप और शी जिनपिंग की दक्षिण कोरिया में अक्तूबर में आमने-सामने हुई आखिरी मुलाकात के बाद टैरिफ पर रोक लगा दी गई. लेकिन दोनों पक्षों की ओर से चेतावनियां जारी रहीं.
राष्ट्रपति ट्रंप को 2016 के चुनाव में मिली जीत के पीछे जो अहम कारण गिनाए गए उनमें उनका व्यापार को अधिक निष्पक्ष बनाने और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से जुड़ी नौकरियां देश में वापस लाने का वादा भी शामिल था.
साल 2018 में ट्रंप ने चीन से होने वाले 250 अरब डॉलर के आयात पर टैरिफ़ की घोषणा की. कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि यही वह पल था जब ट्रेड वॉर शुरू हुआ.
उसी साल ट्रंप ने अन्य व्यापारिक साझेदारों, जिनमें मेक्सिको, कनाडा और यूरोप शामिल थे, उन पर भी शुल्क लगाए. ट्रंप ने शुल्क लगाने के पीछे तर्क दिया कि ये देश अमेरिका का फायदा उठा रहे थे.
निंग लेंग जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में पॉलिसी रिसर्चर हैं. उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ये कदम चीन के लिए झटका था.
लेंग ने कहा, “यह पहली बार था जब चीन ने ट्रंप के साथ गंभीरता से बातचीत की. शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि ट्रंप ऐसा कदम उठाएंगे.”
उस समय, चीन व्यापार के लिए अमेरिका पर बहुत अधिक निर्भर था.

