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सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान: ट्रंप ने मुस्लिम देशों पर बढ़ाया अब्राहम समझौते में शामिल होने का दबाव, कहा- वे हमारे कर्जदार

वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति ने अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होने को लेकर खाड़ी देशों पर दबाव बढ़ा दिया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है, जब ईरान के साथ तनाव खत्म करने के लिए बातचीत का दौर जारी है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ कोई भी समझौता इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या पाकिस्तान, मिस्र, तुर्की, कतर और सऊदी अरब अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार होते हैं।

हाल ही में कैबिनेट बैठक में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब, कतर और अन्य देशों को इन समझौतों पर तत्काल हस्ताक्षर कर देना चाहिए। ट्रंप ने यह भी कहा कि उनके विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर इस पर काम कर रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि “सच कहूं तो मुझे लगता है कि ये उनका हम पर कर्ज है। अगर वे ऐसा करते हैं, तो यह ऐतिहासिक होगा।”

दूसरे देशों को शामिल करने पर जोर

मीडिया से बातचीत के दौरान, ट्रंप ने अपने दूत स्टीव विटकॉफ से पूछा कि क्या और भी देशों को इस समझौते में शामिल होने के लिए मनाया जा सकता है। इसके जवाब में विटकॉफ ने कहा कि हम इसके लिए जोर लगा रहे हैं। इसके बाद ट्रंप ने कहा कि अगर खाड़ी देश इसमें शामिल होने से मना करते हैं तो वॉशिंगटन मध्य-पूर्व के संघर्ष को खत्म करने की कोशिशों पर फिर से विचार कर सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने UAE समेत उन देशों की तारीफ की जो पहले से ही इस फ्रेमवर्क का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि इजरायल के साथ अब्राहम समझौते में शामिल होने से सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों को आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही तरह से फायदा होगा।

अब्राहम समझौता साल 2020 में डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के आखिर में पेश किया गया था। इसका नाम अब्राहम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में सम्मान की नजर से देखा जाता है। इसके तहत अरब देशों और इजरायल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने पर जोर दिया गया है। इस समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन, इजरायल के साथ संबंध स्थापित करने वाले पहले खाड़ी देश बने। बाद में मोरक्को और सूडान भी इसका हिस्सा बने। सऊदी अरब ने भी इसमें शामिल होने की दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन गाजा युद्ध शुरू होने के बाद रियाद ने अपने कदम पीछे खींच लिए।

 

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