संवेदनशीलता और रचनात्मकता से गढ़ा व्यक्तित्व, जहाँ समाजसेवा बन जाती है स्वभाव –
भीतर का कलाकार हर भूमिका में संवेदनशीलता और रचनात्मकता घोल देता है। यही दृष्टि कार्यों को केवल औपचारिक नहीं रहने देती, बल्कि उन्हें अर्थ, आत्मा और उद्देश्य प्रदान करती है। समाजसेवा यहाँ कोई दायित्व नहीं, बल्कि स्वभाव है— जहाँ भी आवश्यकता दिखाई दी, सहायता अपने आप आगे बढ़ी।


“जिस दिल में इंसानियत ज़िंदा हो,
वहाँ सेवा अपने आप जन्म लेती है।”
एक आदर्श शिक्षक: बच्चों के जीवन में संस्कार, आत्मविश्वास और दिशा का सूत्रधार –
एक आदर्श शिक्षक के रूप में भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही। शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि बच्चों के भीतर आत्मविश्वास, संस्कार और सही दिशा का बीज बोया गया। अनेक बच्चों के जीवन को सही मार्ग मिला, उनके सपनों को उड़ान मिली और उनके भविष्य को एक ठोस आकार मिला।
“शिक्षक वह नहीं जो सिर्फ पढ़ाए,
शिक्षक वह है जो जीवन गढ़े।”
एक खिलाड़ी की दृष्टि: अनुशासन, धैर्य और खेल भावना की मिसाल –
एक खिलाड़ी के रूप में खेल को हमेशा खेल की भावना से खेला गया। जीत-हार से ऊपर अनुशासन, धैर्य और खेल भावना को रखा गया। मैदान में संघर्ष करना, नियमों का सम्मान करना और हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना—यही खेल का वास्तविक अर्थ माना गया।
“खेल जीतने से नहीं,
चरित्र गढ़ने से महान बनाता है।”
आध्यात्मिक यात्रा: शांति, सकारात्मकता और ईश्वर की अनुभूति से जीवन को जोड़ा –
आध्यात्मिक यात्रा भी उतनी ही गहरी और सच्ची रही। एक स्पिरिचुअल हीलर के रूप में अनेक लोगों को आत्मिक शांति, सकारात्मकता और भीतर की शक्ति से जोड़ा गया। एकांत-वास, आत्मचिंतन और साधना के माध्यम से यह समझ विकसित हुई कि ईश्वर हर प्राणी में विद्यमान है। इसी दृष्टि ने सबको साथ लेकर चलने की भावना को और सशक्त बनाया।
“जो हर प्राणी में ईश्वर देख ले,
उसका जीवन ही साधना बन जाता है।”
पत्रकारिता में सत्य और साहस: नैतिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य की मिसाल –
पत्रकारिता में सत्य और साहस सर्वोपरि रहे। सच्ची और सही खबर सामने लाना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और सामाजिक कर्तव्य माना गया। दबाव, डर या प्रलोभन कभी सच के मार्ग में बाधा नहीं बने।
“सच अगर साथ हो,
तो अकेलापन भी ताकत बन जाता है।”
स्वाभिमान इस पूरी यात्रा की रीढ़ रहा। जीवन ने कई बार गिराया, कई बार परखा, लेकिन बिखरने का अवसर कभी नहीं दिया गया। हर चोट ने मजबूत बनाया, हर ठोकर ने सोच को और स्पष्ट किया।
“जो टूटकर भी खड़ा हो जाए,
वही वास्तव में अपराजेय होता है।”
दिखावे की जगह खामोशी को चुना गया। बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी सहारे के, अकेले चलकर अपने लिए रास्ता बनाया गया। मंज़िल तक पहुँचने की कोई जल्दबाज़ी नहीं थी— बस हर कदम में ईमानदारी, धैर्य और अटूट विश्वास था।
“खामोश मेहनत का शोर
एक दिन पूरी दुनिया सुनती है।”
यह प्रोफाइल उस नारी शक्ति की कहानी है,
जो शब्दों से नहीं, कर्म से बोलती है—
जो गिरकर भी रुकती नहीं,
जो खेल में भी शुद्ध रहती है,
जो साधना में भी मानवता खोजती है,
और अकेले चलकर भी इतिहास रचती है।
“रास्ते खुद बनते हैं,
जब इरादे पत्थर जैसे हों।”
डिस्क्लेमर
यह लेख Sushma जी के जीवन और योगदान का सम्मान स्वरूप लिखा गया है। इसमें व्यक्त विचार और विवरण लेखक के दृष्टिकोण पर आधारित हैं। इसमें उल्लिखित अनुभव, संघर्ष और उपलब्धियाँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी तथा निजी साक्षात्कार पर आधारित हैं।


