🌍 जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट: सुषमा जी का नेतृत्व और दृष्टिकोण
नई दिल्ली: बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ और वैश्विक ऊर्जा संकट आज दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। बाढ़, सूखा, तूफ़ान और जंगल की आग जैसी घटनाएँ न केवल पर्यावरण पर असर डाल रही हैं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को भी प्रभावित कर रही हैं।
विचारक और नेतृत्व विशेषज्ञ सुषमा जी का मानना है कि वास्तविक नेतृत्व केवल पद या अधिकार से नहीं, बल्कि प्रभाव और दृष्टिकोण से पहचाना जाता है। जटिल समस्याओं का समाधान करने के लिए सहयोगियों की क्षमताओं को पहचानना, उन्हें सशक्त बनाना और आवश्यकता पड़ने पर ढाल बनकर खड़ा रहना अनिवार्य है।
🔹 पारंपरिक ऊर्जा स्रोत अब पर्याप्त नहीं
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में अचानक वृद्धि ने ऊर्जा संकट को और बढ़ा दिया है। ऐसे समय में सौर, पवन और हाइड्रो जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना केवल विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यक समाधान बन गया है।
सुषमा जी का कहना है कि नीति निर्माण और ऊर्जा योजनाएँ स्पष्ट और निर्णायक होनी चाहिए, लेकिन उनमें मानवीय संवेदना और विवेक भी शामिल होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण है कि प्रशासनिक प्रज्ञा, सूक्ष्म नियोजन और अडिग प्रतिबद्धता के माध्यम से ही स्थायी समाधान संभव हैं।
🔹 नेतृत्व और समाधान की कुंजी
सुषमा जी के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सच्चा नेतृत्व पद या अधिकार से नहीं, बल्कि कर्म और प्रभाव से मापा जाता है। यही दृष्टिकोण स्थायी और प्रभावशाली समाधान की कुंजी है।
उनकी यह सोच स्पष्ट रूप से बताती है कि संकट के समय में दृष्टिकोण, स्पष्ट निर्णय, सहयोग और नवीन ऊर्जा विकल्प ही हमारे लिए भविष्य सुरक्षित करने का मार्ग हैं।
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