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असम में बदरुद्दीन अजमल किसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं- BJP या कांग्रेस को?

बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF असम में अपनी सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रही है. AIUDF नेता के निशाने पर तो मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ही नजर आते हैं, लेकिन उनकी निगाह में कांग्रेस चढ़ी हुई है. वैसे भी कांग्रेस से बदरुद्दीन अजमल के खफा होने की खास वजह भी है.

 

2021 के असम विधानसभा चुनाव में AIUDF और कांग्रेस का गठबंधन महाजोट के बैनर तले चुनाव लड़ा था, लेकिन चुनाव बाद कांग्रेस ने गठबंधन तोड़ दिया था. तीन साल बाद कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल को और बड़ा झटका दिया. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रकीबुल हसन ने ढुबरी सीट पर बदरुद्दीन अजमल को 10 लाख से ज्यादा वोटों के फासले से हरा दिया.

असम विधानसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल को सबसे ज्यादा डर और गुस्सा कांग्रेस से ही है, बीजेपी पर भले ही ज्यादा हमलावर क्यों न हों. कांग्रेस के खिलाफ हो जाने से मुस्लिम वोट बंट जाते हैं, और ऐसा होना बदरुद्दीन अजमल के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है.

बदरुद्दीन अजमल को असम चुनाव में इस बार AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी का साथ मिला है. ओवैसी ने पहले ही AIUDF के समर्थन का ऐलान किया था. और, बदरुद्दीन अजमल के मुताबिक, जल्दी ही ओवैसी उनके लिए प्रचार भी करने वाले हैं.

 

AIUDF नेता बदरुद्दीन अजमल का दावा है कि असम चुनाव 2026 के बाद ‘मियां मुसलमान’ असम में हावी हो जाएंगे, और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का असर कम हो जाएगा. असल में, बंगाली बोलने वाले असम के मुस्लिम समुदाय को मियां कह कर संबोधित किया जाता है.

बीजेपी का चुनाव घोषणा पत्र जारी करने के बाद, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि अगर बीजेपी तीसरी बार सत्ता में आती है, तो प्रवासियों को निष्कासित करने वाले कानून को लागू किया जाएगा. यह कानून जिला आयुक्तों को 24 घंटे के भीतर अवैध प्रवासियों को हटाने का अधिकार देता है.

 

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, ‘बांग्लादेशी मियां मुसलमानों के अतिक्रमण के खिलाफ हमारा अभियान और तेज होगा. उन्हें जमीन का एक इंच भी अपने पास रखने की इजाजत नहीं दी जाएगी. मैं भरोसा दिलाता हूं कि अगले पांच साल में हम मियां मुसलमानों की कमर तोड़ देंगे.’

 

बदरुद्दीन अजमल मुख्यमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया में मियां मुसलमानों के प्रभाव बढ़ने की बात कही थी. असम की लगभग 3.12 करोड़ की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 34 फीसदी है. और, मूल असमिया मुसलमान आबादी का करीब 4 फीसदी ही है. असम में करीब 22 विधानसभा सीटों पर ‘मियां मुस्लिम’ बुलाए जाने वाले लोगों का प्रभाव है, और चुनावों में वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

 

हिमंता बिस्वा सरमा अपनी तरफ से साफ कर चुके हैं कि मूल असमिया मुसलमानों से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. भारत के धर्मनिरपेक्ष देश होने की दुहाई देते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बार कहा भी था, मुसलमानों से मुझे कैसी प्रॉब्लम हो सकती है. लेकिन, जब बांग्लादेशी मुसलमान और घुसपैठियों की बात आती है तब प्रॉब्लम जरूर होती है.

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