Shankaracharya Controversy: शंकराचार्य विवाद क्या है?
नई दिल्ली
हाल के दिनों में Shankaracharya Controversy लगातार सुर्खियों में है। खासतौर पर ज्योतिषपीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयानों को लेकर धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। ऐसे में आम लोगों के मन में सवाल है—शंकराचार्य विवाद क्या है, अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कब शंकराचार्य बने और भारत में कुल कितने शंकराचार्य हैं?
शंकराचार्य विवाद क्या है?
शंकराचार्य विवाद मूल रूप से धार्मिक परंपरा और आधुनिक राजनीति के टकराव से जुड़ा हुआ है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने—
- सनातन धर्म
गाय संरक्षण
जाति व्यवस्था
सरकारी नीतियों
जैसे मुद्दों पर खुलकर बयान दिए हैं।
इन बयानों को लेकर एक वर्ग उन्हें धर्म की आवाज़ मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे राजनीति में हस्तक्षेप करार देता है। यही मतभेद आज के Shankaracharya Controversyकी जड़ है।
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शंकराचार्य कब बने?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती
👉 सितंबर 2022 में
👉 ज्योतिषपीठ शंकराचार्य (बदरीनाथ, उत्तराखंड) नियुक्त हुए।
वे ज्योतिषपीठ के पूर्व शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य रहे हैं। शंकराचार्य बनने के बाद से ही वे अपने स्पष्ट विचारों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में हैं।
शंकराचार्य किसकी पूजा करते थे?
यह प्रश्न अक्सर सर्च किया जाता है—“शंकराचार्य किसकी पूजा करते थे?”
आदि शंकराचार्य
अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे और स्मार्त परंपरा का समर्थन करते थे।
वे पंचायतन पूजा में विश्वास रखते थे, जिसमें पाँच देवताओं की उपासना होती है—
भगवान शिव
भगवान विष्णु
देवी शक्ति
भगवान गणेश
भगवान सूर्य
उनका मानना था कि सभी देव एक ही ब्रह्म के विभिन्न रूप हैं।
भारत में कुल कितने शंकराचार्य हैं?
भारत में चार शंकराचार्य पीठ हैं, जिनकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी—
1. श्रृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक)
2. द्वारका शारदा पीठ (गुजरात)
3. गोवर्धन मठ, पुरी (ओडिशा)
4. ज्योतिषपीठ, बदरीनाथ (उत्तराखंड)
👉 इस तरह भारत में कुल 4 शंकराचार्य होते हैं।
शंकराचार्य और राजनीति
आज के दौर में शंकराचार्य केवल धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की आवाज़ भी बन चुके हैं।
यही कारण है कि उनके बयान कभी धार्मिक समर्थन, तो कभी राजनीतिक विवाद का रूप ले लेते हैं।
निष्कर्ष
Shankaracharya Controversy यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिक लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल है। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का शंकराचार्य बनना इस बहस को और व्यापक बना रहा है, जिसमें धर्म, समाज और राजनीति—तीनों शामिल हैं।
गोविंद सोनी/संतों का समागम/दिल्ली

