जानिए क्यों इसे कहा जाता है गणतंत्र दिवस की असली परीक्षा
नई दिल्ली।
हर साल 26 जनवरी को राजपथ (कर्तव्य पथ) पर होने वाली भव्य गणतंत्र दिवस परेड से पहले एक बेहद अहम आयोजन होता है—फुल ड्रेस रिहर्सल। यह रिहर्सल केवल अभ्यास नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक दिन की रीयल-टाइम टेस्टिंग होती है, जिसमें परेड के हर सेकंड, हर कदम और हर सलामी की बारीकी से परख की जाती है।
क्या होती है फुल ड्रेस रिहर्सल?
फुल ड्रेस रिहर्सल में परेड को ठीक उसी तरह आयोजित किया जाता है, जैसे 26 जनवरी को किया जाएगा। इसमें सेना, अर्धसैनिक बल, झांकियां, बैंड, एनसीसी कैडेट्स और फ्लाई-पास्ट तक शामिल होते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि इस दिन राष्ट्रपति की जगह वरिष्ठ सैन्य अधिकारी सलामी लेते हैं।
फुल ड्रेस रिहर्सल और 26 जनवरी की परेड में मुख्य अंतर
-
अतिथि:
-
26 जनवरी: राष्ट्रपति और मुख्य अतिथि
-
फुल ड्रेस रिहर्सल: शीर्ष सैन्य अधिकारी
-
-
सुरक्षा व्यवस्था:
-
दोनों दिनों में लगभग समान, लेकिन 26 जनवरी को और सख्त
-
-
समय और अनुशासन:
-
रिहर्सल में टाइमिंग की बारीकी से जांच
-
-
प्रसारण:
-
रिहर्सल सीमित कवरेज के साथ, मुख्य परेड का लाइव राष्ट्रीय प्रसारण
-
क्यों है फुल ड्रेस रिहर्सल इतनी जरूरी?
-
किसी भी तकनीकी या समन्वय की कमी को अंतिम समय में सुधारने का मौका
-
झांकियों की स्थिति, गति और अनुशासन का मूल्यांकन
-
फ्लाई-पास्ट के दौरान वायुसेना की टाइमिंग का अंतिम परीक्षण
-
सुरक्षा एजेंसियों द्वारा सुरक्षा व्यवस्था का फाइनल रिव्यू
आम लोगों के लिए खास मौका
फुल ड्रेस रिहर्सल के दिन सीमित संख्या में आम नागरिकों को परेड देखने की अनुमति दी जाती है। इस वजह से कई लोग इसे कम भीड़ में परेड देखने का सुनहरा अवसर मानते हैं।
निष्कर्ष
फुल ड्रेस रिहर्सल दरअसल 26 जनवरी की परेड की रीढ़ होती है। इसी दिन तय होता है कि गणतंत्र दिवस का आयोजन कितना अनुशासित, भव्य और यादगार बनेगा। कहें तो यह परेड की अंतिम परीक्षा है, जिसके बाद देश 26 जनवरी को अपने गौरवशाली पल को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।

