उत्तराधिकारी का ऐलान: चंद्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को सौंपा गुप्त साम्राज्य का शासन
गुप्त वंश के इतिहास में उत्तराधिकार की यह घटना राजनीतिक परिपक्वता और भावनात्मक गहराई का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है। जब चंद्रगुप्त प्रथम उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंचने लगे, तो उन्होंने राजपाट छोड़कर शासन की जिम्मेदारी अपने पुत्र समुद्रगुप्त को सौंप दी। खास बात यह थी कि समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त प्रथम के सबसे बड़े पुत्र नहीं थे, इसके बावजूद उन्हें उत्तराधिकारी चुना गया।
योग्यता बनी उत्तराधिकार का आधार
समुद्रगुप्त ने अपनी निष्ठा, न्यायप्रियता और वीरता से यह साबित कर दिया था कि वे शासन संभालने के लिए सबसे योग्य हैं। इन्हीं गुणों ने उन्हें पिता की दृष्टि में सर्वोत्तम उत्तराधिकारी बनाया।
इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख में दर्ज ऐतिहासिक क्षण
समुद्रगुप्त के उत्तराधिकारी बनने का सबसे जीवंत और प्रमाणिक वर्णन इलाहाबाद के प्रसिद्ध स्तंभ शिलालेख में मिलता है। शिलालेख के अनुसार,
“चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने पुत्र समुद्रगुप्त को यह कहते हुए गले लगा लिया कि— तुम एक महान आत्मा हो। यह कहते समय कोमल भावनाओं से उनके शरीर के सारे बाल खड़े हो गए।”
यह वर्णन न केवल राजनीतिक निर्णय को दर्शाता है, बल्कि पिता-पुत्र के बीच के भावनात्मक संबंध को भी उजागर करता है।
दरबार में मिली-जुली प्रतिक्रिया
जैसे ही समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी घोषित किया गया, दरबार में मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ दरबारी हर्ष से फूले नहीं समाए, जबकि कुछ के चेहरे उतर गए। यह स्पष्ट था कि यह फैसला सभी को समान रूप से स्वीकार्य नहीं था।
पिता का भावुक संदेश
घोषणा के बाद चंद्रगुप्त प्रथम ने आँसू भरी आँखों से समुद्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा,
“अब इस दुनिया की रक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारी है।”
यह कथन गुप्त साम्राज्य के इतिहास में एक ऐसे क्षण को दर्शाता है, जहां शासन का हस्तांतरण केवल सत्ता का नहीं, बल्कि कर्तव्य और धर्म का भी था।
समुद्रगुप्त ने आगे चलकर अपने कार्यों से यह सिद्ध किया कि पिता का यह निर्णय गुप्त साम्राज्य के लिए दूरदर्शी और ऐतिहासिक साबित हुआ।

